| يوسف صفتم، مقيم زندان | | يعقوب دلم، نديم احزان |
| من در چه آتشم ز اخوان | | او در چه آب بد ز اخوت |
| چون تير و قلم نحيف و عريان | | چون صفر و الف تهي و تنها |
| يک مشتريم نه پيش دکان | | صد رزمهي فضل بار بسته |
| آري ز تنور خاست طوفان | | از دل سوي ديده ميبرم سيل |
| صورتگر اين کبود ايوان | | شنگرف ز اشک من ستاند |
| از ننگ شکسته نام اران | | يارب چه شکسته دل شدستم |
| از شر فسانه گوي شروان | | الحق چه فسانه شد غم من |
| گاه از خر اعورم به افغان | | گاه از سگ ابترم به فرياد |
| وان زير بري است موش دندان | | اين خيره کشي است مار سيرت |
| بنشسته چو گربه در پي آن | | من جسته چو باغبان پس اين |
| چون نيستم از صفت چو ايشان | | هم صورت من نيند و اين به |
| ايشان ز بهميه من ز انسان | | نسبت دارند تا قيامت |
| هان اي دعوات نيم شب، هان | | جز دعوت شب مرا چه چاره |
| از فضل خداي حال گردان | | خاقاني اميد را مکن قطع |
| در سايهي صدر باش پنهان | | از ديدهي روزگار بينور |
| کز باطل شد سپيد ديوان | | بگزيدهي حق موفق الدين |
| در خلد ممالک اوست رضوان | | عبد الغفار کز سر کلک |
| جودي و حري و قاف و ثهلان | | عمان و محيط و نيل و جيحون |
| با جدول و خردلند يکسان | | هر هشت، بر سخا و حلمش |
| وافکنده کمال تو چو يزدان | | اي کرده جلال تو چو تقدير |
| بر دوش جهان رداي فرمان | | در گوش زمانه حلقهي حکم |
| احمد سيري و حيدر احسان | | خورشيد دلي و مشتري زهد |
| کهتر چو عطارد و چو حسان | | شد لاجرم از براي مدحت |
| در خدمت تو درست پيمان | | با پشت و دل شکسته آمد |
| انس انس و سلوک سلمان | | هم بر در مصطفي نکوتر |
| سري است دراين ميان نه طغيان | | گر مدح تو ديرتر ادا کرد |
| گر چند نهاي به وحي و برهان | | يعني تو محمدي به صورت |
| آمد پس از انبيا به کيهان | | او خاتم انبياست ليکن |
| از حيوان و نبات و ارکان | | مقصود طبيعت آدمي بود |
| بعد از سه کتب رسيد فرقان | | بعد از سه مراتب آدميزاد |
| از اول فکرت فراوان | | انديک عمل بود به آخر |
| از بعد گيا رسد به بستان | | گل با همه خرمي که دارد |
| ميوهاش نخورند جز به آبان | | بس شاخ که بشکفد به خرداد |
| حلوا ز پس آورند بر خوان | | افزار ز بس کنند در ديگ |
| زد خنجر شاه را به افسان | | اي آنکه صرير خامهي تو |
| بر شير دلان دريد خفتان | | غريد پلنگ دولت تو |
| در عصبهي تو نمود عصيان | | آن کس که تو را نداشت طاعت |
| کز پور قباد ديد نعمان | | آن خواهد ديد از شه شرق |
| تا پخچ شود ميان ميدان | | يعني فکند به پاي پيلش |
| بد گوي تو نيم کار شيطان | | تو صاحب کار جبرئيلي |
| در نعمت تو نموده کفران | | پروردهي نان توست و از کفر |
| واخواست کند به حشر حنان | | نانش مفرست پيش کز تو |
| احرار صدف مثال عطشان | | نان تو چو قطرهي ربيع است |
| لل گردد به بحر عمان | | قطره که وديعت صدف شد |
| زهري گردد هلاک حيوان | | باز ار به دهان افعي افتد |
| سرسام خلاف و درد خذلان | | بيمار دل است و دارد از کبر |
| پرگويد و هرزه روز بحران | | مشنو ترهات او که بيمار |
| اوهام ز رتبت تو حيران | | اي ديدهي عقل در تو شاخص |
| کار چو مني به برگ و سامان | | بيياري چون تويي نگردد |
| نتوان کردن ز چوب ثعبان | | بيامر خدا و کف موسي |
| تو صد سپهي به يک قلمران | | من صد رهيم تو را ز يک دل |
| من موي شکافم و تو سندان | | از نکتهي بکر و نوک خامه |
| مسپار مرا به دست نسيان | | بسپرده شدم به پاي اعدا |
| از پنجهي روزگار برهان | | برهان داري، مرا به يک لفظ |
| افسرده به سرد سير حرمان | | تو خورشيدي و من در اين عصر |
| بسيار نظر کند به ويران | | در من نظري بکن که خورشيد |
| از شاعر فاضل و سخندان | | گيرم که دل تو بينياز است |
| بر درگه تو غلام و دربان | | هم هندوکي ببايد آخر |
| ز آن دشمن روي نامسلمان | | هنگام سخن مکن قياسم |
| کي شکر خايد او بدين سان | | آن کو ز دهان ريد همه سال |
| الحق اولي است آن به بهتان | | تصنيف نهاده بر من از جهل |
| ببريد سپيد موي بهمان | | گفتا ز براي عشقبازي |
| از خانه خدائيش پشيمان | | ليکن جائي که باشد آنجا |
| او جسته خلافم اينت نادان | | من دادم پاسخ اينت نکته |
| با يک دو کشيش رنگ کشخان | | وين طرفه که مبدي گرفته است |
| حکمت نه و دين اهل يونان | | معني نه و نقش ريش و دستار |
| تعليم نکرده در دبستان | | اقليم گرفته در حماقت |
| از باد بروت ريش پالان | | کرده ز براي خربطي چند |
| وز تربيتش جهان پشيمان | | يزدانش ز لعنت آفريده |
| و امروز به سجده گشته کسلان | | در طفلي بوده راکع و جلد |
| پيغامبري ز مکر و دستان | | از مسخرگي گذشت و برخاست |
| بر امت او هزار چندان | | صد لعنت باد بر وجودش |
| چون سست فرو گذاشت سبحان | | سبحان الله کاين سگک را |
| از حيف زمان و صرف دوران | | اي در کنف تو عالم ايمن |
| او را چه عم از هزار سلطان | | آن را که غلامي تو دادند |
| از حد عراق تا خراسان | | هرکس که نيوشد اين قصيده |
| خاقاني را به صدر خاقان | | داند که تو نيک پايمردي |
| ليک از پي نام نز پي نان | | زين به سخن آورم به فرت |
| اين نقد بسختهام به ميزان | | عيد آمدو من مصحف عيد |
| پيش تو کنم به عيد قربان | | دارم دلکي کبوترآسا |
| بادي به هزار عيد شادان | | بادي به چهار فصل خرم |
| خصم تو فرود هفت بنيان | | راي تو و راي هفت طارم |
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